नीतीश का चुनावी मिसाइल- डोमिसाइल
नीतीश ने चुनाव से डोमिसाइल नीति को किया लागू

चुनाव के वक्त सभी पार्टियां चुनावी-स्टंट करती हैं। एक से एक लोक-लुभावन घोषणाएं भी सुनाई देती हैं। यह अलग बात है कि चुनाव के बाद उसे जुमला करार दे दिया जाय। नीतीश कुमार एक से बढ़कर एक राजनीतिक घोषणा कर रहे हैं। इसमें कोई बुराई भी नही है कि सरकार क्यों घोषणा पर घोषणा कर रही है? सच यह है कि सियासत में भक्ति-आंदोलन के लिए कोई जगह नहीं होती है। चुनाव के दौरान मूल्य और मानक की यूं ही धज्जियां उड़ती रहती हैं। बहुत सारे तिकड़म किए जाते हैं चुनाव जीतने के लिए। चारा-चोर और चुनाव-चोर की चर्चा तो आप सुन ही रहे होंगे।
अगस्त महीना चल रहा है। यह पूरा महीना ही क्रांति से जुड़ा हुआ है। इस अगस्त में फ्रीडम-मूवमेंट की बहुत सारी यादें भी तरोताजा हों रही हैं। लेकिन इसी बीच फ्री-फ्री की आवाज भी प्रतिध्वनित होने लगी है। फ्री बिजली और फ्री पानी की कहानी चर्चा में है। मुफ्त की रबड़ी के खिलाफ महामना मोदी जी भी हुंकार भर चुके हैं। संसद में उन्होंने इसपर जोरदार भाषण भी दिया था। पर वे तो बातें थी, उन बातों का क्या? इन्ही की डबल इंजन की सरकार बिहार में मुफ्त की रेवड़ियां बांटने में लग गई हैं। राबड़ी राज में रबड़ी की बात भले न हुई हो पर राजग में यह सब कुछ हो रहा है।
आखिर नेताओं की किसी बात पर जनता क्यों भरोसा करें? जब नेताओं को बटमारी और हकमारी की बीमारी लग गई हो तो क्या कहा जा सकता है? चुनकर आए प्रतिनिधि को तो अपने घोषणा-पत्र को भी पढ़ने या याद करने का वक्त नहीं रहता है। इन्हें घोषणा की याद दिलाई जाय तो ये यही कहेंगे कि क्या यह घोषणा मैने ही की थी? यही तो स्थिति है आज के राजनेताओं और राजनीति की।
नीतीश ने डोमिसाइल नीति को लागू कर दिया है। टीआरई 4 और 5 एक्जाम में स्थानीय युवाओं को ही अब जगह मिलेगी। बाहरी के लिए रास्ता अब बंद। बिहार की प्रतिभा तो पूरे देश में डंका बजाती है। इस मास्टरी की परीक्षा में भी बिहार के छात्र, बाहर से आए हुए छात्रों को टिकने नहीं देते तो अच्छा होता। बाहरी छात्र आते तो भी अव्वल बिहारी ही होते। बिहार के मेहनती छात्रों से ऐसी उम्मीद की जा सकती है। आखिर क्यों डर गए बिहार के छात्र? छात्रों की डोमिसाइल की मांग असुरक्षाबोध के कारण तो नहीं। वैसे डर का होना स्वाभाविक ही है।
बिहार की शिक्षा व्यवस्था पटरी से उतरी हुई है। उचित पढ़ाई नहीं, समय पर परीक्षा नहीं, समय पर परिणाम नहीं। प्रतियोगिता परीक्षा में दुराचार की अनंत कथाएं भी हैं। बीपीएससी की कहानी को कौन नहीं जानता? कितने छात्र मार खाए और कितने मरे और मारे गए? बिहार प्रतिभा पैदा करता है पर पाल कर रखने की स्थिति में नहीं है। शिक्षित हो या अशिक्षित, सभी का पलायन जारी है। बीस साल में कैसा बनाया बिहार को। अरण्यकाल का अरण्यरोदन उचित नहीं है।
बीस साल बाद भी यह हॉरर-पॉलिटिक्स खत्म नहीं हुई। बिहार का पैसा अगर बाहर जाने से रुक जाय तो भी कल्याण हो जाएगा बिहार का। इन बीस वर्षों में ऐसी स्थिति नहीं बन पाई कि बेंगलुरु और हैदराबाद के छात्र बिहार आने के लिए बेचैन हों। कहां के लोग यहां मास्टरी करने आएंगे? शायद नहीं। कुछ दबे कुचले प्रांत के ही छात्र बिहार आने का रुख करेंगे? बिहार में बाहर के छात्र आते तो स्वस्थ प्रतिस्पर्धा पैदा होती। बिहार की प्रतिभा को देख बाहरी को डरना चाहिए, न कि बिहारी को।
जब भी सवाल करो तो लोग बीस साल पहले चले जायेंगे और कहेंगे कि देखा नहीं कि कैसा था जंगल राज। अरे यह क्यों नहीं बता रहे हो कि तुम्हारा मंगल राज कैसा है?
नीतीश दुबारा लौटेंगे या नहीं, यह भविष्य के गर्भ में है। अगर नहीं लौटेंगे तो कौन इन घोषणाओं की जिम्मेवारी लेगा?
डोमिसाइल पर जदयू के गुटखा मार्का भोभाशंखों की आवाज सुनाई दे रही है। एक प्रवक्ता ने तंज किया कि राजद के भीतर भी डोमिसाइल लागू हो। बाहरी दिमाग के आधार पर राजद चल रहा है। स्थानीय राजद कार्यकर्ताओं की हकमारी हो रही है। इशारा राजद सांसद संजय यादव की ओर है जो हरियाणा से संबंध रखते हैं।
यह राजद की मजबूरी हो सकती है कि इसे नेताओं की आउटसोर्सिंग करनी पड़ रही है। पर राजग का क्या? इन्हें भी तो गुजराती बंधुओं को बुलाना पड़ता है। बिना मोटा भाई और छोटा भाई का इनका कल्याण होना मुश्किल है। सच है कि तेजस्वी के मुकाबले में बिहार में किसी के पास ताकत नहीं रह गई है। राजग के पास कागजी शेर तो बहुत हैं, पर भीड़-जुटाऊ कोई नहीं हैं। बिहार के कुछ लौंडे से भाजपा के बड़े लीडर आतंकित अवश्य हैं। पीके और तेजस्वी परेशानी के सबब बने हुए हैं।
बिहार में एक बड़े राजनीतिक-संस्कृति के निर्माण की जरूरत है। दुर्भाग्य है कि बिहार की जनता सवालों पर टिकती ही नहीं है। मौका जब आता है तो जाति देखने और खोजने लग जाती है। जातीय चेतना से थोड़ा भी ऊपर आ जाय तो नेताओं को अपनी औकात का पता चल जाएगा। ठगी क्या होती है यह समझ में आ जाएगी। पर वो दिन कब आएगा?
डोमिसाइल से बिहार किसी दिव्यता के करीब नहीं पहुंचेगा। यह दीनता की ही अभिव्यक्ति है। बिहार के बच्चे केवल गुरुजी ही बनेंगे या और कुछ? आखिर बिहार में अवसरों की बाढ़ कब आएगी? स्कूल कॉलेज कब दुरुस्त होंगे? वीसी, प्रिंसिपल की बोली लगनी कब बंद होगी? क्वेश्चन सेटर पर लगाम कब लगेगा? कुछ भी हो डोमिसाइल का मिसाइल मारक साबित नहीं होगा। बीस साल का हिसाब तो देना ही होगा नीकू बाबू।