सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: सरकार राज्यपालों की मर्जी पर नहीं चल सकती

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नई दिल्ली । 21 अगस्त 25 । सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए साफ कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनी हुई सरकार राज्यपालों की मर्जी पर नहीं चल सकती। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्यपाल की भूमिका केवल संवैधानिक सीमा तक है, वे सरकार के कामकाज में मनमाने ढंग से दखल नहीं दे सकते।

मामला क्या है?

कुछ राज्यों में हाल के दिनों में राज्यपाल और राज्य सरकारों के बीच टकराव की स्थिति सामने आई थी। राज्यपालों द्वारा विधेयकों को रोकने, फैसलों को लंबित रखने और मंत्रिपरिषद की सलाह पर अमल न करने जैसी शिकायतें अदालत तक पहुंचीं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता दिखाई और कहा कि यह लोकतंत्र की आत्मा के खिलाफ है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

अदालत ने कहा कि भारत का संविधान एक संसदीय प्रणाली पर आधारित है, जहां वास्तविक अधिकार जनता द्वारा चुनी हुई सरकार के पास होते हैं। राज्यपाल का पद सम्मानित और संवैधानिक है, लेकिन वे “सुपर सरकार” नहीं हो सकते। अदालत ने चेतावनी दी कि अगर राज्यपाल अपने संवैधानिक दायरे से बाहर जाते हैं, तो लोकतंत्र कमजोर होगा।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद विपक्षी दलों ने कहा कि यह फैसला लोकतंत्र को बचाने वाला है। वहीं, कुछ सत्ताधारी नेताओं ने कहा कि राज्यपाल का पद केंद्र और राज्य के बीच सामंजस्य बनाए रखने के लिए है, और उसे विवाद का कारण नहीं बनना चाहिए।

लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था

यह फैसला भारतीय लोकतंत्र की उस बुनियादी भावना को मजबूत करता है जिसमें जनता की चुनी हुई सरकार को निर्णय लेने का अधिकार है। अदालत ने साफ किया कि राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सलाह माननी ही होगी और संविधान के दायरे में रहकर काम करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट की यह सख्त टिप्पणी न केवल राज्यों और राज्यपालों के बीच चल रहे विवादों पर विराम लगाने की कोशिश है, बल्कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था को सशक्त बनाने वाला कदम भी है। यह फैसला बताता है कि भारत में अंतिम सत्ता जनता और उसकी चुनी हुई सरकार के पास ही है।

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