गोबर गैस और कार्बन उत्सर्जन में कटौती

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भारत जैसे कृषि प्रधान देश में पशुपालन और गोबर का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। परंपरागत रूप से गोबर का उपयोग खाद, ईंधन और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए किया जाता रहा है। लेकिन आधुनिक समय में इसका महत्व और भी बढ़ गया है, क्योंकि गोबर गैस (बायोगैस) का उत्पादन न केवल स्वच्छ ऊर्जा का स्रोत है, बल्कि यह कार्बन उत्सर्जन में भी उल्लेखनीय कमी लाता है।

गोबर गैस क्या है?

गोबर गैस को बायोगैस भी कहा जाता है। यह गोबर और अन्य जैविक अवशेषों के एनारोबिक पाचन (ऑक्सीजन रहित वातावरण में सूक्ष्मजीवों की क्रिया) से उत्पन्न होती है। इसका मुख्य घटक मीथेन (CH4) है, जो एक स्वच्छ ईंधन के रूप में खाना बनाने, बिजली उत्पादन और वाहनों के लिए उपयोग किया जा सकता है।

कार्बन उत्सर्जन पर असर
  1. जैविक अपशिष्ट का प्रबंधन – गोबर और अन्य जैविक कचरे को खुले में सड़ने के बजाय बायोगैस प्लांट में डालने से मीथेन सीधे वातावरण में नहीं जाती।

  2. कोयले और लकड़ी पर निर्भरता कम – गोबर गैस के उपयोग से लकड़ी और कोयले जैसे पारंपरिक ईंधनों की खपत घटती है, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी आती है।

  3. नवीकरणीय ऊर्जा का प्रसार – गोबर गैस पूरी तरह से नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है, जो जीवाश्म ईंधनों के स्थान पर इस्तेमाल होकर जलवायु परिवर्तन को धीमा करती है।

  4. कार्बन क्रेडिट का अवसर – गांवों और शहरों में बड़े पैमाने पर बायोगैस संयंत्र लगाने से अंतरराष्ट्रीय कार्बन क्रेडिट योजनाओं का लाभ भी उठाया जा सकता है।

ग्रामीण और शहरी लाभ
  • ग्रामीण क्षेत्रों में – यह किसानों को मुफ्त ईंधन उपलब्ध कराता है, रसोई में धुआं घटाता है और महिलाओं के स्वास्थ्य की रक्षा करता है। साथ ही बायोगैस प्लांट से निकलने वाला स्लरी उत्कृष्ट जैविक खाद बनकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है।

  • शहरी क्षेत्रों में – नगर निगम के कचरे और डेयरी उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट का उपयोग करके बायोगैस प्लांट लगाकर बिजली और ईंधन तैयार किया जा सकता है।

भविष्य की दिशा

भारत में “गोबर धन योजना” और “राष्ट्रीय बायोगैस एवं खाद प्रबंधन कार्यक्रम” जैसी योजनाएँ पहले से ही इस दिशा में काम कर रही हैं। यदि पंचायत स्तर पर सामुदायिक बायोगैस प्लांट बनाए जाएं, तो कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी लाने के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है।

गोबर गैस केवल ग्रामीण ऊर्जा जरूरतों का समाधान नहीं है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी अहम योगदान दे सकती है। यह सतत विकास, स्वच्छ ऊर्जा, कचरा प्रबंधन और कार्बन उत्सर्जन में कटौती – इन सभी लक्ष्यों को एक साथ साधने का प्रभावी उपाय है।

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