जैविक खेती में गाय की भूमिका
भारत की कृषि परंपरा सदियों से गाय पर आधारित रही है। गाय केवल दूध ही नहीं देती बल्कि उसका गोबर और गोमूत्र खेती के लिए अनमोल साधन साबित होते हैं। आधुनिक समय में जब रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों ने भूमि की उर्वरता को कम कर दिया है, तब जैविक खेती (ऑर्गेनिक फार्मिंग) की ओर लौटने का रास्ता खुला है। इसमें गाय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
1. गोबर और जैविक खाद
गाय का गोबर प्राकृतिक खाद के रूप में उपयोग किया जाता है। गोबर से बनी कम्पोस्ट खाद और वर्मी कम्पोस्ट मिट्टी को पोषक तत्वों से भर देती है। इससे मिट्टी की नमी बनी रहती है और पौधों को आवश्यक खनिज और सूक्ष्म पोषक तत्व मिलते हैं।
2. गोमूत्र से कीटनाशक
गोमूत्र में प्राकृतिक रूप से जीवाणुरोधी और फफूंदरोधी गुण पाए जाते हैं। इसे विभिन्न जड़ी-बूटियों के साथ मिलाकर जैविक कीटनाशक बनाया जा सकता है। इससे फसल पर कीटों का प्रकोप कम होता है और मिट्टी पर कोई हानिकारक असर नहीं पड़ता।
3. जीवामृत और घनजीवामृत
गाय के गोबर और गोमूत्र से तैयार जीवामृत और घनजीवामृत मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ाते हैं। ये सूक्ष्मजीव पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध कराने में मदद करते हैं। जीवामृत का नियमित छिड़काव जैविक खेती में फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों को बढ़ाता है।
4. ऊर्जा का स्रोत
गाय के गोबर से बायोगैस तैयार की जाती है। इससे किसान रसोई गैस और बिजली की बचत कर सकते हैं। बायोगैस प्लांट से निकलने वाला स्लरी भी उत्कृष्ट खाद के रूप में खेतों में काम आता है।
5. मिट्टी की सेहत और स्थायी खेती
गाय से प्राप्त संसाधनों के उपयोग से मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है। यह पद्धति रासायनिक खेती की तुलना में अधिक टिकाऊ है और आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वस्थ पर्यावरण का आधार बनाती है।
जैविक खेती केवल एक खेती का तरीका नहीं बल्कि सतत विकास का मॉडल है, जिसमें गाय केंद्रीय भूमिका निभाती है। आज जब प्रदूषण, जल संकट और खाद्य सुरक्षा जैसी चुनौतियाँ सामने हैं, तो गाय आधारित जैविक खेती भारत को आत्मनिर्भर और स्वस्थ बना सकती है।