पुतिन का बयान: ट्रम्प भारत-चीन को धमकाना बंद करें
मास्को,। 04 सितम्बर 25 । रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से भारत और चीन को टैरिफ के नाम पर धमकाना बंद करने को कहा है। उन्होंने कहा कि दोनों (भारत-चीन) देश उनकी धमकी से डरने वाले नहीं हैं।
चीन की विक्ट्री डे परेड में शामिल होने के बाद बुधवार (3 सितंबर) को मीडिया से बात करते हुए पुतिन ने कहा कि ट्रम्प, भारत या चीन से इस तरह से बात नहीं कर सकते।
रूसी राष्ट्रपति ने कहा, ‘भारत और चीन का इतिहास हमलों से भरा है। अगर इन देशों का कोई नेता कमजोरी दिखाएगा तो उसका राजनीतिक करियर खत्म हो सकता है।’
दरअसल, ट्रम्प भारत पर कई बार आरोप लगा चुके हैं कि भारत रूसी तेल खरीदता है और यूक्रेन जंग को रूस का साथ दे रहा है। ट्रम्प अपने टैरिफ को जंग सुलझाने वाला हथियार बताते हैं।
ट्रम्प ने बुधवार को द स्कॉट जेनिंग्स रेडियो शो में कहा था कि इस (टैरिफ) नीति की वजह से अमेरिका को ताकत मिलती है। ट्रम्प ने टैरिफ को जादुई हथियार कहा और दावा किया इसके जरिए उन्होंने 7 जंग रोकी हैं।
SCO में एकसाथ नजर आए मोदी, पुतिन और जिनपिंग
1 सितंबर को चीन के तियानजिन में SCO की बैठक हुई। बैठक से पहले फोटो सेशन के दौरान भारतीय PM नरेंद्र मोदी, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति पुतिन एकसाथ नजर आए।
तीनों नेताओं को एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए भी देखा गया। भारत, चीन और रूस के नेताओं ने आपसी दोस्ती का प्रदर्शन किया, जिससे अमेरिका बेचैन हो गया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस को विशेष और विश्वसनीय साझेदार बताया। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि दुनिया के दो सबसे ज्यादा आबादी वाले देशों को दोस्त होना चाहिए।
ट्रम्प के सलाहकार बोले थे- मोदी को पुतिन-जिनपिंग के साथ देखना शर्मनाक
ट्रम्प के ट्रेड सलाहकार पीटर नवारो ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस और चीन के नेताओं के साथ नजदीकियों पर आपत्ति जताई थी।
नवारो ने कहा था कि मोदी का शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन के साथ खड़ा होना शर्मनाक है। उन्होंने सवाल उठाया कि पता नहीं मोदी क्या सोच रहे हैं, हमें उम्मीद है कि वे समझेंगे कि उन्हें रूस की बजाय हमारे साथ होना चाहिए।
पुतिन की दलील
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भारत और चीन वैश्विक स्थिरता के स्तंभ हैं, इसलिए किसी भी तरह का धमकी भरा रवैया अंतरराष्ट्रीय संतुलन बिगाड़ सकता है।
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पुतिन ने कहा कि दुनिया को “सहयोग और साझेदारी” की भाषा बोलनी चाहिए, न कि “प्रतिस्पर्धा और धमकी” की।
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उन्होंने अमेरिका को नसीहत दी कि यदि वह वाकई वैश्विक नेतृत्व करना चाहता है तो उसे आपसी सम्मान और विश्वास पर आधारित नीति अपनानी होगी।