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निर्मल बाबा के मिनरल दरबार पर रोक लगाना जरूरी है

बाबा - उद्योग का निर्मल बाबा एक नया ब्रांड है .इस ब्रांड को प्रोमोट करने में हर चैनल आगे हो गया है .दो कौड़ी के प्रश्न और दो कौड़ी का उत्तर ,यह खेल चल रहा है इस दरबार में .निर्मल  अपने फूहड़ टिप्स को आशीर्वाद का एक अच्छी पेकिंग बनाकर बेच रहे हैं . दरबार में एक पूछता है - बाबा मुझे मूली का पराठा अच्छा नहीं लगता क्या करूं .? बाबा का उत्तर -मूली नहीं आलू का पराठा खाओ ,फलदायक होगा .एक निराश पत्नी ने बाबा से पूछा - बाबा आजकल मेरे पति का मूड नहीं बनता क्या करूं ? बाबा किस कंडोम कंपनी का नाम लेते हैं यह  निर्मल बाबा की जय  के शोर में दब जाता है .धर्म ,आध्यात्म ,पूजा ,पाठ सबकी बाबा ने रेड़ पेल दी है .बाबा देश के नौजवान को पुरुषार्थहीन बनाने का घटिया खेल खेल रहे हैं . आपके पास अगर दो हजार रुपया है तो निर्मल बाबा का आशीर्वाद खरीद सकते हैं . इस प्रकार  के बढ़ते बाबा बाज़ार पर नियंत्रण जरूरी हो गया है .इसमें सरकार से ज्यादा समाज की भूमिका होगी 

निर्मल बाबा  का रामदेव के बाद सबसे बड़ा आर्थिक साम्राज्य हो गया है .अनेकों ट्रस्ट ,संस्थाओं का जाल बिछा कर देश के हताश , निराश लोगों को बाबा बेवकूफ बना रहे है .
 
कुछ दशक पहले तोता लेकर पंडित चौराहे पर बैठते थे .पिंजरा से तोता बाहर आता और बंद लिफाफा पंडित को थमा देता ,. भाग्य जानने वाले स्वयं ही पढ़ लेते .पढ़कर कुछ उत्साहित तो  कुछ निराश होते . ठीक वही कस्टमर दूसरे दिन जाता तो तोता दूसरा लिफाफा निकालता और २४ घंटे में ही भाग्य बदल जाता था . यह केवल मनोरंजन होता था .पैसा देनेवाले भी और लेने वाले पंडित भी इसे मनोरंजन ही समझते  .देवघर से आफ सीजन में पंडा झोला लेकर आते भाग्य बताने  के बदले अनाज मांग कर ले जाते . बचपन में कुछ महिलाएं पंडा को बेवकूफ भी बनाती.  सिंदूर छुपाकर पूछती कि बाबा मेरी शादी कब होगी ? अक्सर पंडा बेवकूफ बनते .  गलत भविष्यवाणी करते जब पंडा पकडे जाते तो हम सबको बड़ा मजा आता ?  बावजूद दरबाजे पर आये पंडों को वापस खाली हाथ नहीं भेजते ? मकई का एकाध छल्ला तो मिल ही जाता था . मदारी का नाच और पंडों की भविष्यवानियाँ बहुत ही मनोरंजक थी .
यह मनोरंजन हमारे अन्धविश्वास का भी हिस्सा था .पंडों की यह कला आजीविका का आधार थी.  इसलिए भारतीय समाज ने उन्हें भी जीने का हक़ देकर उदारता दिखाई .कभी कभी लोग उलाहना भी देते कि मजबूत हाथ- पैर के बावजूद भीख क्यों मंगाते हैं ? दूसरों का भग्य ठीक कर रहे हैं तो अपना भग्य क्यों नहीं बदलते ? यह आम औसत सवाल जबाव थे . इस उलाहना के मूल में  यजमान के पास पैसा का नहीं रहना भी होगा या फिर पुरुषार्थी समाज बनाने चाहत  रही होगी ? 
पर आज बाबागिरी एक बाज़ार ,एक कार्पोरेट का शक्ल ले लिया है .बाबा बाज़ार के लिए साधना नहीं ,संसाधन की जरूरत होती है . जिस बाबा के पास जितना संसाधन वह उतना बड़ा ही चमत्कारी दिख रहा है . 
विज्ञानं और तकनीक के इस विस्फोटक - युग में क्या नहीं हो रहा है ? विज्ञानं और तकनीक का मॉडल टेलीवीजन आज अन्धविश्वास , भाग्यवाद को फ़ैलाने का औजार बन गया है . मीडिया का रोल भी हास्यास्पद हो गया है . भूत ,भाग्य , भगवान और भाटगिरी i  यही तो पहचान बन गयी है .एक से एक फ्रौड़ मौजूद है .हर चैनल पर कंठी ,माला, रुद्राक्ष ,राशिफल .लाल पीली हर रंग की किताब बेची जा रही हैं .वास्तुशास्त्रियों की बाढ़ आ गयी है .फूटपाथ पर आबाद हिंदुस्तान के लिए वास्तुशास्त्री क्या करेंगें ? कटे हुए हाथ का भी भविष्य होता है .मनुष्य निर्मित विषमता और शोषण का जिम्मेवार भगवान को मानना दुर्भाग्य ही है .चोर अपराधी का सितारा देश में बुलंद है .
धार्मिक मूल्यों की धजीयाँ उदा रहे हैं ये पाखंडी लोग ? 
इस समाज को आगे आने चाहिए . झूठ फरेब कर अट्टालिका खड़ा करना संसाधन जमा करना यह धार्मिक कृत्य नहीं ? क्यों समाज इसे सम्मान देता है ? सावधान होने की जरूरत है 
इन बाबाओं का पूरें देश में भक्त नहीं एजेंटों का जाल बिछा हुआ है . समागम से पूर्व भरे के भक्त जुटते है और वही नाटक जो निर्मल दरबार में हो रहा है .देश के  हर कोने के दलाल मौजूद रहते हैं .सबका कमीशन पक्का .रहता है . धर्म के नाम पर ,भावनाओं और आस्थाओं के नाम पर बाबाओं का चल रहा गिरोह बेलगाम है .
विना मिहनत किये ये परजीवी बाबा आज तक समाज में जिन्दा हैं ?  बुद्ध , महावीर ,तुलसी ,कबीर को न तो प्रेस  की जरूरत थी न ही प्रवंचानों की ? उन्हें दलालों की फ़ौज खडी करने की जरूरत ही कहाँ थी ? कबीर जीवन भर कपडा बीन कर अपनी साधना पूरी की .विना श्रम का एक रोटी भी उन्हें नहीं चाहिए ? 
निर्मल बाबा बेशर्मी से बकबास करते रहते हैं .दो हजार देकर आशीर्वाद पाने वाले कोई मनरेगा और बीपीएल वाले नहीं हैं  .ये सब पढ़े लिखे  बेवकूफ लोग हैं जो इन बाबाओं को बाज़ार प्रदान कर रहे हैं .
अहमदावाद में रिक्शा वाला भी बापू के नाम पर साबरमती आश्रम नहीं, मोरारी बापू और आसाराम बापू के पास लेकर चला जायेगा .जैसे डाक्टर हर शहर में रोगी लाने का पैसा रिक्शा वाला को देता है ?
निर्मल दरबार एक पूरी व्यवस्था का नाम है . निर्मल बाबा से घर माँगने पर बंगला दे देते हैं . मनमोहन सिंह को इस दरबार में अवश्य जाना चाहिए. इंदिरा आवास योजना का संकट ही ख़त्म हो जायेगा .रेल मंत्री और वित्त मंत्री को इस दरबार में जरूर जाना चाहिए .एक मिनट में देश की समस्या छू मंतर हो जायेगी ? निर्मल बाबा देश को जाहिलों और बेवकूफों का देश समझ कर अपना  भाग्य बाज़ार फैलाये हुए हैं .एक तो चोरी , उस पर सीनाजोरी ? अपनी बेवकूफी को प्रसारित और प्रचारित करना हास्यस्पद है ?

 

 



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